harela festival uttarakhand

हरेला त्यौहार

Harela, हरेला त्यौहार , uttarakhand

हरेला, जैसा की नाम से ही पता चल रहा है की ये त्यौहार हरयाली, पेड़ पोधो आदि के लिए मनाया जाता होगा। उत्तराखंड का हर एक पर्व समाज को एक सन्देश देता है। चाहे वह हरेला हो घुघुतीआ हो या कोई अन्या त्यौहार। आपने हरेले के बारे म वैसे तो बहुत सुना होगा पर आज में अपने हरेले का बताता हु , हम बचपन मै कैसे हरेला त्यौहार मानते थे। त्यौहार का मतलब स्कूल की छुट्टी सबसे ज्यादा तो खुशी त्योहारों मैं इसी की होती थी बचपन मैं तब इतनी अकल कहा थी।

हरेला त्यौहार

हरेला श्रावण मास लगने से 9 दिन पहले से शुरू हो जाता है। पहले दिन खेत से साफ मिट्टी लेकर उसे अच्छे से छानकर 2 रिंगाल की टोकरियों या फिर कोई अन्य चकोर डिब्बों मै डाल दिया जाता है। फिर शाम को उन डिब्बों मैं 5 या 7 प्रकार के अनाज बोये जाते है। इसे अपने घर के मंदिर म रखा जाता है। और हरेले को सूर्य की रोशनी से बचाके अँधेरे में जाता है। हरेले मै रोज सुबहे शाम ताजे साफ पानी से सींचा जाता है। और फिर नवे दिन शाम को इसकी गुड़ाई होती है इसको कलावे से अच्छी तरह बांधते है। दसवे दिन एक टोकरी अपने इष्ट देव के मंदिर ले जाते है और एक घर में काटते है। उसके बाद घर के प्रत्येक सदस्य को घर के बुजुर्ग द्वारा हरेला पूजा जाता है। और शाम को प्रत्येक घर से अपने खेतो मै एक पेड़ लगाया जाता है।

हरेला पूजते वक़्त ये आशिर्बाद दिया जाता है।

“जी रया ,जागि रया ,यो दिन बार, भेटने रया,

दुबक जस जड़ हैजो,पात जस पौल हैजो,

स्यालक जस त्राण हैजो, हिमालय में ह्यू छन तक,

गंगा में पाणी छन तक, हरेला त्यार मानते रया,

जी रया जागी रया.”

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